Ganga Aarti

कल का दिन कोई खास तो नहीं था, सिवाय इसके की कल मैंने एक भव्य गंगा आरती देखी और उसका हिस्सा बना। गंगा, हिमालय की गोद से निकाल कर बंगाल की खाड़ी में मिल जाने वाली ये लगभग 2500 km की ना सिर्फ एक नदी है बल्कि हिन्दू धर्म में एक खास जगह है इसकी। गंगा को हम पूजते है, नमस्कार करते है, और कितने शर्म की बात है की उसे मैला भी हम ही करते है।

Gangaकल यानी की 12 जुलाई 2014, शनिवार का दिन था, यानी के मेरे लिए छुट्टी का दिन, मौज मस्ती का दिन। हर शनिवार मैं और मेरे कुछ दफ्तर के मित्र, हम लोग सुबह क्रिकेट खेलते है, और हर शनिवार की तरह इस शनिवार भी हमने खूब खेला। मैंने घर वापस आ कर खाना खाया और सो गया। थकान इतनी थी की 11:00 बजे जो मैं बिस्तर पर गिरा सीधा मेरी नींद शाम के 3:30 में खुली। शाम में मैं यह तय ही नहीं कर प रहा था की मैं क्या करूँ। तब मैंने यूं ही अपनी साइकिल उठाई और गांधी मैदान की तरफ निकाल गया। मैंने रास्ते में ही अपने एक पुराने मित्र को कॉल किया और उसे गांधी मैदान घूमने के लिए बुलाया। पर उसने ही मुझे NIT चौक पर बुला लिया, कहा की भाई तेरे पास तो साइकिल है ही मुझे टेम्पो से आना पड़ेगा इसलिए तू ही यहाँ आजा। मैं भी चला गया। हालांकि मुझे इंतजार करना पसंद नहीं है फिर भी उसने मुझे आधा घंटा इंतजार करवाया। आने के बाद उसने बताया की हर शनिवार और रविवार NIT घाट पर गंगा आरती होती है, सो तुम भी चलो देख लेना। मैं ना तो ज्यादा धार्मिक किस्म का इंसान हूँ ना ही मुझे पूजा पाठ में कोई खास दिलचस्पी है। पर कभी-कभी ना जाने क्यों मैं कुछ धार्मिक जगहों पर ना चाहते हुए भी चला जाता हूँ।

खैर अब मैं वहाँ मौजूद था और आरती आरंभ होने ही वाली थी। वहाँ लोगों का सैलाब उमड़ा हुआ था। बच्चे, बूढ़े और जवान सभी हाथों को जोड़े खड़े थे। बच्चों का उत्साह तो देखते ही बनता था मानो कोई त्योहार आ गया हो। शाम की लालिमा लिए वक्त गुजर रहा था, आसमां की सुंदरता को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। कलकल बहती गंगा मानो कुछ गुनगुना रही हो, आप बस उसके किनारे पर बैठ कर अपनी आंखें बंद करो और एक अनोखी शांति का एहसास होना शुरू हो जाता है। मुझे ऐसे भी नदियों और तालाबों के किनारे बैठना अच्छा लगता है।

वक्त हो चुका था, सूर्यास्त शुरू होते ही आरती प्रारम्भ हुई और एक कतार में 4 या 5 पुजारियों ने आरती की विधि शुरू की। उनकी आरती की मुद्राएँ देख के ऐसा लग रहा था मानो सभी के सभी किसी शास्त्रीय नृत्य कला का प्रदर्शन कर रहे हों। आमतौर पर मैं ज्यादा भीड़-भाड़ वाली जगहों से दूर ही रहना पसंद करता हूँ। पर उस भिड़ में भी मुझे काफी शांति मिल रही थी। आग की लपटे मुझे कभी इतनी खूबसूरत नहीं लगी जितनी की उस वक्त आरती के दीपों में लग रही थीं। वक्त कैसे गुजर गया पता भी नहीं चला और आरती खत्म हो गयी। फिर मेरे मित्र ने प्रसाद लिया और मुझे भी उसमें से थोड़ा दिया। हम लोगों ने आइसक्रीम खायी और फिर थोरी देर वक्त बिताने के बाद अपने-अपने रास्ते निकाल लिए।


3 thoughts on “गंगा आरती: एक अनोखा अनुभव”

  1. बहुत खूब, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की मैं भी वही पे था|

  2. क्या बात है बॉस बहुत अच्छा लिखते हैं आप, इंतजार रहेगा आपके दूसरे अनुभव का ……
    आपका मित्र आशुतोष कुमार ..

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